Bheruji Mandir Ringas, इसमें रींगस के भेरूजी के चमत्कारी मंदिर के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दी गई है।
राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में स्थित रींगस कस्बा अपनी धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है जिसमें मौजूद भैरू बाबा का मंदिर देशभर में श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
इस मंदिर का इतिहास लगभग 550 से 700 वर्ष पुराना माना जाता है। यह मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग 52 पर रींगस कस्बे से पहले भैरूजी मोड़ पर स्थित है।
भैरव बाबा का पौराणिक इतिहास
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, एक समय ब्रह्मा जी के पाँचवें मुख ने भगवान शिव की आलोचना की थी। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने रुद्र रूपी भैरव स्वरूप में ब्रह्मा जी का पाँचवां सिर अलग कर दिया।
इस घटना के कारण भैरव बाबा को “ब्रह्महत्या” का दोष लगा। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु के निर्देशानुसार तीनों लोकों की यात्रा की। मान्यता है कि पृथ्वी लोक पर उनकी इस पदयात्रा की शुरुआत रींगस से ही हुई थी, इसलिए यह स्थान विशेष रूप से पवित्र माना जाता है।
शिव के रुद्र और भैरव का संबंध
रुद्र शब्द का अर्थ केवल एक अवतार नहीं है, बल्कि यह भगवान शिव के उग्र, संहारक और ऊर्जा स्वरूप को दर्शाता है अर्थात शिव का उग्र, शक्तिशाली और संहारकारी रूप ही रुद्र कहलाता है।
बाद में शस्त्रों में यही रुद्र एकादश रुद्र (11 रूप) के रूप में व्यवस्थित हुए। भगवान शिव के 11 रुद्र इस प्रकार हैं-
हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शंभु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्व, कपाली
एकादश रुद्र की सूची में भैरव नाम नहीं है। भैरव को एक अलग, उच्च स्तर का उग्र तांत्रिक स्वरूप माना गया है। भैरव ने ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया, इसलिए इन्हें कपाली भी कहा जाता है।
मंदिर स्थापना की अद्भुत कथा
भैरू बाबा मंदिर की स्थापना से जुड़ी कथा अत्यंत रोचक और चमत्कारिक है।
लगभग 600 वर्ष पहले गुर्जर समाज के पूर्वज, जो मंडोर (जोधपुर) में रहते थे, गाय चराते समय एक छोटी गोल पत्थर की मूर्ति को भैरव बाबा मानकर अपने साथ रखते थे।
वे जहां भी रुकते, तालाब किनारे मूर्ति निकालकर पूजा करते और फिर झोली में रख लेते। मंडोर से पालू (दूदू) और बेनाड़ (जयपुर) होते हुए वे रींगस पहुंचे।
एक रात तालाब किनारे विश्राम के बाद सुबह जब मूर्ति उठाने लगे, तो वह अपनी जगह से हिली ही नहीं। तभी आकाशवाणी हुई कि “मैंने पृथ्वी लोक की यात्रा यहीं से प्रारंभ की थी और अब मैं यही निवास करना चाहता हूँ।”
इसके बाद गुर्जर प्रतिहार परिवार वहीं बस गया और भैरव बाबा की नियमित पूजा-अर्चना शुरू कर दी। आज भी यही परिवार कई पीढ़ियों से मंदिर की सेवा कर रहा है।
मंदिर का विकास और संरचना
प्रारंभ में मंदिर खुला हुआ था और चारों ओर श्मशान स्थित थे। शमशान में उड़ती भस्म के प्रभाव से बाबा की मूर्ति समय के साथ विशाल रूप धारण करती गई।
श्मशान में स्थित होने की वजह से इन्हें मसानिया भैरू (मसाणिया भैरू) के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2013 में गुर्जर समाज द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।
मंदिर के बाहर सती माता की एक छतरी स्थित है, जिसके शिलालेख पर 1669 ईस्वी अंकित है, जो इसकी प्राचीनता का महत्वपूर्ण प्रमाण है। छतरी के जीर्णोद्धार के बाद यह शिलालेख इसके प्लास्टर में दब गया है इसलिए अब बाहर नजर नहीं आता है। मंदिर को इस छतरी के निर्माण से भी दो सौ साल पुराना माना जाता है।
बताया जाता है कि 1669 ईस्वी में सती माता अपनी शादी के बाद यहाँ धोक देने आई थी। यहाँ हुए एक युद्ध में उनके पति का देहांत हो गया था उसके पश्चात वो सती हो गई थी।
मंदिर के पास ही एक जोहड़ यानी तालाब मौजूद है जिसके पानी को बड़ा चमत्कारी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस तालाब में नहाने से सभी तरह की स्किन डिजीज ठीक हो जाती है। साथ ही जिन लोगों के संतान नहीं होती उनके संतान हो जाती है।
धार्मिक मान्यताएं और विशेषताएं
भैरव बाबा को भगवान शिव का पांचवां रुद्र अवतार माना जाता है। माना जाता है कि बाबा की मूर्ति एक बार स्थापित होने के बाद कभी नहीं हिली।
मंदिर में प्रतिदिन सुबह-शाम विशेष आरती होती है (लगभग आधे-आधे घंटे)। यहां आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है, जिससे श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
प्रमुख पर्व और मेले
कालाष्टमी (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी) के दिन भैरव बाबा का प्राकट्य दिवस माना जाता है। इस दिन विशेष पूजा, हवन, भजन-कीर्तन और आतिशबाजी होती है।
लक्खी मेले:
चैत्र नवरात्रि
वैशाख शुक्ल पक्ष
भाद्रपद शुक्ल पक्ष (वार्षिक मेला)
आश्विन नवरात्रि
माघ शुक्ल पक्ष
इन मेलों में लाखों श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए आते हैं।
भैरव बाबा को प्रिय भोग
भैरव बाबा को चढ़ाए जाने वाले प्रमुख प्रसाद:
पुआ-पापड़ी
बाटी-बाकले
गुलगुले, पूड़ी, पकौड़ी
लड्डू-पतासे
लौंग-पतासे
कुछ स्थानों पर शराब चढ़ाने की भी परंपरा है
बताया जाता है कि पहले यहां पशु बलि दी जाती थी, लेकिन अब एक संत के आह्वान पर इसे पूर्णतः बंद कर दिया गया है।
प्रसिद्ध श्रद्धालु और मान्यताएं
जयपुर के पूर्व सांसद गिरधारीलाल भार्गव इस मंदिर को अपना आराध्य मानते थे। वे हर चुनाव परिणाम के दिन यहां आकर पूजा करते थे और जीत के बाद ही प्रसाद चढ़ाकर वापस जाते थे।
मान्यता है कि पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत के माता-पिता ने यहीं संतान प्राप्ति की मन्नत मांगी थी जिसके बाद इनका जन्म हुआ था। भैरव बाबा के आशीर्वाद से जन्म होने की वजह से इनका नाम भैरोंसिंह रखा गया।
निष्कर्ष
रींगस का भैरू बाबा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और चमत्कारों का अद्भुत संगम है। यहां की स्थापना कथा, मूर्ति का न हिलना, आकाशवाणी की घटना और सदियों से चली आ रही पूजा परंपरा इसे विशेष बनाती है।
शेखावाटी क्षेत्र की धार्मिक पहचान की शुरुआत इसी स्थान से होती है, और यही कारण है कि यह मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए विश्वास और भक्ति का केंद्र बना हुआ है।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer)
इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें क्योंकि इसे आपको केवल जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।
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Tourism
