Vishnu Mandir Kashniyawad Udaipur, इसमें उदयपुर में कुंडेश्वर महादेव के पास किशनियावाड़ यानी कृष्णवट में मौजूद प्राचीन विष्णु मंदिर की जानकारी दी है।
उदयपुर के किशनियावाड़ (कृष्णवट) गाँव में स्थित यह प्राचीन विष्णु मंदिर न केवल एक पुरातात्विक धरोहर है, बल्कि सातवीं सदी के भारतीय इतिहास का जीवंत प्रमाण भी है। लगभग तेरह सौ वर्ष पुराना यह मंदिर आज अपनी खंडहर अवस्था में भी मेवाड़ के गौरवशाली गुहिल वंश की गाथा सुना रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस मंदिर का निर्माण 661 ईस्वी में हुआ था। शिलालेखों (कुटिल लिपि) के अनुसार, गुहिल वंश के शासक अपराजित के सेनापति वराहसिंह की पत्नी रानी यशोमती ने इस भव्य देवालय को बनवाया था।
इतिहासकारों के अनुसार, इस स्थान का मूल नाम 'मधुकैटभरिपु मंदिर' था। एक विशेष ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि 'मंदिर' शब्द का प्रथम प्रयोग संभवतः इसी देवालय के लिए किया गया था, जो इसे धार्मिक और भाषाई दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
लोक मान्यताएं: 'कृष्ण मंदिर' और पांडवों का संबंध
इतिहास जहाँ इसे सातवीं सदी का बताता है, वहीं स्थानीय जनश्रुतियों में इस मंदिर को लेकर गहरी आस्था और प्राचीन कथाएँ प्रचलित हैं:
भगवान कृष्ण का मंदिर: क्षेत्रीय निवासी इस स्थान को 'कृष्णवट' के नाम से जानते हैं और इसे मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण का मंदिर मानकर पूजते हैं।
पांडव कालीन संबंध: स्थानीय लोगों के बीच यह मान्यता भी प्रबल है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा किया गया था। इस क्षेत्र में प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास या प्रवास के दौरान यहाँ समय बिताया था।
स्थानीय भाषा में महत्व: स्थानीय भाषा में इस भव्य मंदिर के लिए कहा जाता है कि इसे 'बने भव' (एक हजार साल से भी अधिक का समय) गुजर चुका है।
स्थापत्य का भव्य और खंडहर स्वरूप
यह मंदिर 'पंचायतन शैली' का एक दुर्लभ उदाहरण है। मुख्य मंदिर एक ऊँची जगती (प्लेटफॉर्म) पर स्थित है, जिसके गर्भगृह में भगवान विष्णु की काले पत्थर की अत्यंत सुंदर मूर्ति विराजमान है। इसकी भव्यता जावर के 'रमास्वामी मंदिर' की प्रतिमा के समान प्रतीत होती है।
वर्तमान स्थिति: समय की मार के कारण पीछे के दोनों सहायक मंदिरों के शिखर नष्ट हो चुके हैं और आगे के मंदिर भी जर्जर अवस्था में हैं।
प्राचीन जल स्रोत: मंदिर के समीप ही एक प्राचीन कुआँ और एक छोटी बावड़ी स्थित है, जो प्राचीन काल के कुशल जल प्रबंधन का प्रतीक है।
संरक्षण की पुकार
मेवाड़ के संपूर्ण गुहिल वंश के इतिहास का साक्षी यह मंदिर आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यद्यपि यहाँ आज भी निरंतर पूजा-पाठ होता है, लेकिन इतिहास के इन बिखरे हुए पन्नों को सहेजने के लिए इस मंदिर को तत्काल राजकीय संरक्षण और जीर्णोद्धार की दरकार है।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer)
इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें क्योंकि इसे आपको केवल जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।
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Tourism
