जयपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर चौमू-अजीतगढ़ रोड पर सामोद कस्बे से लगभग 3-4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है महार कला गाँव। कई धरोहरों तथा ऐतिहासिक घटनाओं को अपने अन्दर समेटे हुए यह गाँव ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
महार कला गाँव का इतिहास आमेर के कछवाहा राजवंश, कुम्भावत कछवाहों, नाथ सम्प्रदाय के संतों तथा प्राचीन धार्मिक परम्पराओं से जुड़ा हुआ है।
इस गाँव की स्थापना आमेर के युवराज कुम्भा के पुत्र उदयकरण ने की थी। बताया जाता है कि आमेर के राजा चंद्रसेन ने अपने पुत्र कुम्भा के पुत्र उदयकरणजी को बरवाड़ा की जागीर प्रदान की थी। उस समय बरवाड़ा पहले शेखावतों के अधिकार में था और वहाँ उनका अधिकार केवल दो पीढ़ियों तक रहा था।
इसी कारण उदयकरण ने बरवाड़ा में रहना उचित नहीं समझा और अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में एक नया गाँव बसाने का निर्णय लिया। इस प्रकार महार गाँव की स्थापना हुई और उदयकरण ने इसे अपना प्रमुख निवास तथा राजधानी बनाया।
उदयकरण के वंशज आगे चलकर कुम्भावत कछवाहों के नाम से प्रसिद्ध हुए। आजादी से पहले महार गाँव कुम्भावत कछवाहों का एक प्रमुख ठिकाना रहा था। गाँव में आज भी शाही परिवार से जुड़ी कब्रें मौजूद हैं, जिन्हें राजपूत और मुगल स्थापत्य कला का उदाहरण माना जाता है।
महार गाँव की स्थापना में संत सालगनाथजी की भूमिका
महार गाँव जिस स्थान पर बसाया गया, वहाँ पहले नाथ सम्प्रदाय के संत सालगनाथजी निवास करते थे। वे अरावली की पहाड़ियों की तलहटी में साधना करते थे।
बताया जाता है कि उदयकरण ने इस स्थान पर गाँव बसाने से पहले संत सालगनाथजी की सलाह और आशीर्वाद प्राप्त किया था। संत की प्रेरणा से यहाँ गाँव बसाया गया और इसे अपना प्रमुख केंद्र बनाया गया।
संत सालगनाथजी का महार गाँव के इतिहास में विशेष स्थान है। जब गाँव में आबादी बढ़ने लगी, तब उन्होंने पहाड़ी पर स्थित अपना पुराना स्थान छोड़कर गाँव के बाहर अपना आसन स्थापित कर लिया।
बाद में उन्होंने वहीं समाधि ली। आज भी उस स्थान पर श्रद्धालु संत सालगनाथजी की पूजा-अर्चना करते हैं। महार गाँव की यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि यहाँ स्थित मालेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना से भी जुड़ी हुई है।
स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, संत सालगनाथजी की प्रेरणा और आदेश पर आमेर के राजा चंद्रसेन की रानी, जो युवराज कुम्भा की माता थीं, ने यहाँ एक छोटा-सा शिव मंदिर बनवाया था।
आगे चलकर इसी मंदिर का विस्तार हुआ और यह मालेश्वरनाथ धाम के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
मालेश्वर महादेव मंदिर की भौगोलिक स्थिति
महार कला गाँव के मुख्य बस स्टैंड से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर मालेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। लगभग 50 फीट ऊँचाई पर बना यह मंदिर तीन तरफ से अरावली की सुरम्य पहाड़ियों से घिरा हुआ है।
इस मंदिर के आसपास बहुत से प्राचीन खंडहरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं, जो इसकी प्राचीनता का जीता-जागता सबूत हैं। प्राकृतिक दृष्टि से यह इलाका नदी, नालों, गुफाओं तथा जंगलों से भरा हुआ है।
यह स्थान बहुत से तपस्वियों की भूमि रहा है, जिनमें भगवान परशुराम का भी नाम लिया जाता है। बारिश के मौसम में यह स्थान अत्यंत रमणीक स्थल में बदल जाता है तथा मंदिर के आसपास कई प्राकृतिक झरने बहने लग जाते हैं।
इन झरनों में दो झरने मुख्य हैं। इनमें एक मंदिर के बगल में बहता है और दूसरा लक्ष्मीनारायण मंदिर से आगे पहाड़ी की तलहटी में गिरता है। मंदिर के बगल वाले झरने की वजह से मंदिर के आसपास का नजारा अत्यंत मनमोहक हो जाता है।
मंदिर के आसपास स्थित चार प्राकृतिक कुंड
इस मंदिर के आसपास प्राकृतिक रूप से निर्मित चार कुंड मौजूद हैं। इन कुंडों के बारे में कहा जाता है कि इनमें बारह महीने पानी भरा रहता है तथा ये कभी भी खाली नहीं होते हैं।
चार कुंडों में से मंदिर के नीचे स्थित शिव कुंड का जल भगवान की पूजा-अर्चना, अभिषेक आदि के काम आता है। दूसरा कुंड पुरुषों तथा तीसरा महिलाओं के स्नान के काम आता है।
चौथा कुंड पहाड़ी पर ऊँचाई पर स्थित है। ये कुंड मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों, सवामणी तथा अन्य धार्मिक कार्यों के लिए प्रमुख जलस्रोत के रूप में काम आते हैं।
मालेश्वर महादेव मंदिर का पौराणिक महत्व
इस स्थान को पौराणिक बताया जाता है, जिसका उल्लेख शिव पुराण में भी होने की मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि यह गाँव पौराणिक काल में राजा सहस्रबाहु की माहिषपुरी या महिष्मती नगरी हुआ करता था। इसी वजह से इस मंदिर का नाम मालेश्वर महादेव मंदिर पड़ने की बात भी कही जाती है।
इस मंदिर का नाम मालेश्वर होने का एक अन्य कारण यह भी बताया जाता है कि मंदिर तीन तरफ से अरावली की जिन सुरम्य पहाड़ियों से घिरा हुआ है, उन्हें मलयागिरी के नाम से जाना जाता है।
मालेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण किसने करवाया था?
मंदिर के निर्माण को लेकर स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक विवरणों में अलग-अलग प्रसंग मिलते हैं। एक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण संवत् 1101 में माचेड़ी महाराज के परिवार ने करवाया था, जिसमें स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है।
वहीं, महार गाँव के इतिहास से जुड़ी स्थानीय परम्परा के अनुसार, संत सालगनाथजी की प्रेरणा पर आमेर के राजा चंद्रसेनजी की रानी ने यहाँ सबसे पहले एक छोटा-सा शिव मंदिर बनवाया था।
बाद में मंदिर का विस्तार हुआ और रावत रामजी ने मंदिर पर एक बड़ा गुंबद बनवाया। इसके साथ ही मंदिर के पास पानी के कुंड और तिबारियों का निर्माण भी कराया गया।
संत सालगनाथजी ने इस शिव मंदिर का नाम मालेश्वरनाथ धाम रखा तथा यहाँ कछवाहा राजवंश के कुलदेवता अम्बिकेश्वर महादेव की प्राण-प्रतिष्ठा की।
इस प्रकार मंदिर का इतिहास आमेर के कछवाहा राजवंश, महार गाँव की स्थापना और नाथ सम्प्रदाय की संत परम्परा से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
मालेश्वर महादेव का स्वयंभू शिवलिंग
मंदिर में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग यहाँ की सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक है। स्वयंभू लिंग का अर्थ है ऐसा शिवलिंग जिसके बारे में मान्यता हो कि वह प्राकृतिक रूप से स्वयं प्रकट हुआ है, न कि किसी व्यक्ति द्वारा स्थापित किया गया है।
स्वयंभू शिवलिंग के प्रकट होने की भी एक रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि पास ही के गाँव माचेड़ी के एक व्यापारी की गायों का झुंड इस स्थान पर चरने के लिए आता था। उस समय जिस स्थान पर आज शिवलिंग है, वहाँ जाल का एक पेड़ हुआ करता था।
झुंड की एक गाय जब उस जाल के पेड़ के नीचे आती थी, तो उसके थनों से अपने आप दूध बहने लग जाता था। इस बात का पता लगने पर व्यापारी भी बड़ा आश्चर्यचकित हुआ।
उसी रात व्यापारी को भगवान ने स्वप्न में दर्शन देकर जाल के पेड़ के नीचे प्रकट होने की इच्छा जताई। बाद में प्रदोष काल में सोमवार के दिन महादेव स्वयंभू लिंग के रूप में यहाँ प्रकट हुए। ऐसी मान्यता है कि इसी घटना के बाद इस स्थान पर शिवलिंग की पूजा-अर्चना प्रारम्भ हुई।
सूर्य की गति के अनुसार झुकने वाला अनूठा शिवलिंग
मालेश्वर महादेव मंदिर के शिवलिंग को लेकर एक विशेष मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि यह शिवलिंग सूर्य की गति के अनुसार अपनी दिशा बदलता है, जिसके कारण इसे देशभर में अनूठा माना जाता है।
जैसा कि सभी जानते हैं, सूर्य की स्थिति के अनुसार वर्ष के लगभग छह महीने उत्तरायण और छह महीने दक्षिणायन की अवधि मानी जाती है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, जब सूर्य उत्तरायण में होता है, तब शिवलिंग उत्तर दिशा की ओर और जब सूर्य दक्षिणायन में होता है, तब दक्षिण दिशा की ओर झुक जाता है।
यह शिवलिंग भूतल से लगभग दो फीट की ऊँचाई तक दिखाई देता है। जिस जलहरी में यह स्थित है, उसमें जल का स्तर एक निश्चित ऊँचाई तक ही रहता है। मान्यता है कि इसमें कितना भी जल डाला जाए, जल का स्तर उस निर्धारित ऊँचाई से अधिक नहीं होता।
मंदिर परिसर में विराजमान अन्य देवी-देवता
मालेश्वर महादेव मंदिर परिसर में भगवान शिव के साथ अन्य देवी-देवताओं के दर्शन भी किए जा सकते हैं। यहाँ दुर्गा माता, भगवान श्रीराम, लक्ष्मणजी और माता जानकी विराजमान हैं। मंदिर के बाहर हर्षनाथ भैरव क्षेत्रपाल के रूप में पूजित हैं।
मंदिर परिसर में संतों का पवित्र धूणा भी मौजूद है, जो इस स्थान की साधना और तपस्या से जुड़ी परम्पराओं की याद दिलाता है। संत सालगनाथजी की तपोभूमि और उनके समाधि स्थल से जुड़ी मान्यताएँ इस पूरे क्षेत्र को धार्मिक दृष्टि से विशेष बनाती हैं।
औरंगजेब के समय मंदिर को नुकसान पहुँचाए जाने की मान्यता
मालेश्वर महादेव मंदिर के इतिहास से जुड़ा एक प्रसंग मुगलकाल का भी बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में इस मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया गया था।
इस प्रसंग के प्रमाण के रूप में मंदिर परिसर में शेषनाग की शैया पर माता लक्ष्मी के साथ विराजमान भगवान विष्णु की एक खंडित मूर्ति मौजूद होने की बात कही जाती है। यह मूर्ति मंदिर परिसर की प्राचीन धार्मिक और कलात्मक विरासत का हिस्सा है।
कहा जाता है कि उस समय शिवलिंग को भी खंडित करने की कोशिश की गई थी, लेकिन पहाड़ी से मधुमक्खियों के झुंड ने हमला कर दिया, जिसके कारण यह प्रयास सफल नहीं हो सका। यह प्रसंग स्थानीय जनमानस में प्रचलित एक धार्मिक मान्यता के रूप में सुनाया जाता है।
बाद में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। इसी दौरान मंदिर पर गुंबद और शिखर का निर्माण भी हुआ। रावत रामजी द्वारा मंदिर के गुंबद तथा आसपास के कुंडों और तिबारियों के निर्माण को भी मंदिर के विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण परम्परा माना जाता है।
महार गाँव और मालेश्वरनाथ धाम की ऐतिहासिक विरासत
महार कला गाँव और मालेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास कई परम्पराओं का संगम है। एक ओर आमेर के कछवाहा राजवंश और उदयकरणजी द्वारा महार गाँव बसाए जाने की कहानी है, तो दूसरी ओर नाथ सम्प्रदाय के संत सालगनाथजी की साधना, शिव मंदिर की स्थापना और बाद में हुए निर्माण कार्यों की परम्परा है।
महार गाँव में मौजूद शाही परिवार की कब्रें, प्राचीन खंडहर, संत सालगनाथजी का स्थान और मालेश्वर महादेव मंदिर इस क्षेत्र की ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं।
अरावली की पहाड़ियों से घिरा यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। विशेष रूप से वर्षा ऋतु में बहते झरने, पहाड़ियों की हरियाली और कुंडों के आसपास का वातावरण यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं तथा प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करता है।
इस प्रकार मालेश्वर महादेव मंदिर केवल भगवान शिव का एक प्राचीन पूजास्थल ही नहीं, बल्कि महार गाँव की स्थापना, कुम्भावत कछवाहों के इतिहास और संत सालगनाथजी की आध्यात्मिक परम्परा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण धरोहर भी है।
